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उपहार (भोजन) आरती

आरती · जय जय दत्त दयाल

जय जय दत्त दयाल करुणानिधी स्वामी । 

अजी करुणाघन स्वामी कर भोजन जगवंदन । 

करी कृपा अत्रिनंदन जय अन्तर्यामी ।।धृ।। 

 

उत्तम पत्र फलादी सुचिरस बनवारी । 

परसे व्यंजन षडरस । खाटे मीठे खारे ।।१।। 

 

कांचन सिंहासनपर बैठे जटाधारी । 

आरती करू पगवंदन । तन मन धन वारी ।।२।। 

 

सुर नर मुनिजन वेधत उच्चारी । 

चंदन अक्षत धूप । घृत दिपकवारी ।।३।। 

 

निर्गुण दृष्टी देव तुम प्रति यश गावे । 

कृपा करो निज जूठन । ठाकूर द्विज पावे ।।४।।